
आज के डिजिटल युग में जहाँ हर कोई सोशल मीडिया और दिखावे की दौड़ में शामिल है, वहीं वृंदावन के प्रसिद्ध संत श्री प्रेमानंद जी महाराज (Premanand Ji Maharaj) का जीवन एक मिसाल पेश करता है। उनके सत्संग सुनने के लिए लाखों लोग उमड़ते हैं, जिनमें बड़े-बड़े सेलिब्रिटी और उद्योगपति शामिल हैं, लेकिन महाराज जी स्वयं एक अत्यंत साधारण और वैराग्यपूर्ण जीवन जीते हैं।
अक्सर लोग सर्च करते हैं कि प्रेमानंद जी महाराज की दिनचर्या (Routine) इतनी कठिन क्यों है? वे कम क्यों खाते हैं और सीमित क्यों सोते हैं? आइए, इस ब्लॉग में संतों के इस ‘साधारण जीवन’ के पीछे छिपे गहरे दर्शन को समझते हैं।
1. कम भोजन और इंद्रिय संयम (Food and Self-Control)
प्रेमानंद जी महाराज के विचार बताते हैं कि भोजन केवल शरीर को चलाने का साधन है, स्वाद का नहीं। संतों के कम खाने के पीछे वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों कारण हैं:
- साधना में एकाग्रता: अधिक भोजन करने से शरीर में सुस्ती आती है, जिससे ध्यान (Meditation) और भजन में बाधा पहुँचती है।
- सात्विक आहार: संत हमेशा सात्विक और अल्पाहार को प्राथमिकता देते हैं ताकि मन शांत रहे और काम-क्रोध जैसे विकारों से बचा जा सके।
2. सीमित नींद और ब्रह्ममुहूर्त का महत्व (Importance of Sleep & Bramhamuhurta)
भक्त अक्सर पूछते हैं कि महाराज जी रात भर जागकर परिक्रमा और भजन कैसे कर लेते हैं? असल में, संतों का जीवन (Life of Saints) अनुशासन पर टिका होता है।
- वह समय जिसे हम सोने में बिताते हैं, संत उसे ‘अमृत वेला’ मानकर ईश्वर की भक्ति में लगाते हैं।
- सीमित नींद उनके मानसिक बल को दर्शाती है। उनके लिए जागने का अर्थ है—मोह-माया की नींद से जागना।

3. शून्य दिखावा: वैराग्य का असली स्वरूप (Zero Show-off & Vairagya)
Premanand Ji Maharaj Lifestyle की सबसे बड़ी विशेषता है उनका ‘दिखावा मुक्त’ होना।
- अहंकार का नाश: महँगे वस्त्र और सुख-सुविधाएँ व्यक्ति के भीतर ‘मैं’ (अहंकार) को बढ़ाती हैं। महाराज जी जैसे संत फटे हुए वस्त्र पहनकर यह संदेश देते हैं कि शरीर नश्वर है और असली सुंदरता आत्मा की है।
- लोक-कल्याण: उनका पूरा जीवन दूसरों के मार्गदर्शन के लिए समर्पित है। जब लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति हो, तो सांसारिक चकाचौंध फीकी लगने लगती है।
4. वृंदावन के संतों की सादगी का विज्ञान
वृंदावन की धरती भक्ति और वैराग्य की है। यहाँ प्रेमानंद जी महाराज जैसे संत ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ के सिद्धांत को जीते हैं। सादगी से जीने पर मन बाहरी दुनिया से हटकर अंतर्मुखी (Inward) हो जाता है, जो आत्म-साक्षात्कार के लिए अनिवार्य है।
निष्कर्ष (Conclusion)
प्रेमानंद जी महाराज जैसे महापुरुषों का साधारण जीवन हमें सिखाता है कि असली सुख सुविधाओं में नहीं, बल्कि संतोष में है। उनका कम खाना, कम सोना और सादगी से रहना हमारे लिए एक प्रेरणा है कि हम भी अपने जीवन से अनावश्यक दिखावे को कम करें और शांति की ओर बढ़ें।


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